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माया और माया का कार्य

माया और माया का कार्य भागवत स्कन्द 11 अ 07 श्लोक 7-8 भगवान् कहते हैं-माया के द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है अर्थात् “माया” के द्वारा जो मोहित (भ्रमित) हो रहे हैं। उन्हीं को ऐसा दुराग्रह होता है, कि यह मेरा है, वह उनका है यह “गंगा” जी हैं, यह यमुना जी हैं, और […]

| मुक्ति का साधन |

शास्त्र का वचन है-” मुक्ति” अर्थात् भगवान् के “परमपद” को प्राप्त करने के लिए” साधक” को तीन वस्तुओं की जानकारी प्राप्त करना परम आवश्यक है। पहला-आकाश’ तथा अग्नि के स्वरूप को अच्छी तरह समझना। दूसरा :-‘भगवान्’ अर्थात् ‘आत्मा’ के स्वरूप को ठीक-ठीक जानना। तीसरा :- ‘जीव’ तथा उसके अज्ञान के स्वरूप को ठीक तरह श्रुति, […]

महापुरुषों की वाणी

महापुरुष कहते हैं जब तक किसी की बुद्धि अन्धविश्वास तथा अन्धपरम्पराओं में जकड़ी रहेगी, विवेक तथा विचार शून्य बनी रहेगी, तब तक कोई भी परमसत्य वस्तु – परमार्थ को जान नहीं सकेगा, चाहे जितना प्रयाश करता रहे, सफलता नहीं मिलेगी। जगत् अर्थात् देश, काल, वस्तु को ही सत्य समझता रहेगा। जिसके कारण दुःखों से पूर्णतया […]

आकाश का स्वरूप

जो आकाश के स्वरूप को नहीं जान पाएगा,वह ईश्वर अर्थात् परमात्मा के स्वरूप को कभी नहीं जान पाएगा, जो भगवान के स्वरूप को नहीं जान पाएगा , वह अपने साथ शुरू को कभी नहीं जान पाएगा। स्वामी महेशानंद 9580882032

भगवान्

जो लोग भगवान् अथवा देवी – देवताओं को अचेतन मूर्तियों की सेवा, पूजा, आरती, भोग, चढ़ावा तथा दर्शन आदि तो नहीं करते हैं, परन्तु चेतन मूर्तियों (प्राणियों) विशेषकर मनुष्यों के साथ धोखाधड़ी, विश्वासघात, झूठ, छल, कपट, अत्याचार अन्याय, अनीति तथा अमयोदित बात, व्यवहार नहीं करते हैं तथ सभी को भगवान् (ईश्वर) की चलती-फिरती प्रतिमा मानकर […]

सत्संग से लाभ

सत्संग से लाभ 1 ईश्वर, जीव, जगत् तथा परमार्थ सत्ता के विषय में सही सही जानकारी हो जाती है । 2 ‘अविद्या’ नष्ट हो जाने के कारण ‘माया-मोह’ नष्ट हो जाते हैं जिससे देश, काल, वस्तु के प्रति सत्यत्व बुद्धि समाप्त हो जाती है।3 रामचरित मानस में बताये गये मानसिक रोगों से ‘मुक्ति’ मिल जाती […]