व्यवहार और परमार्थ

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व्यवहार और परमार्थ

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वेदांत के अद्वैत अर्थात् एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति को समझने के लिए व्यावहारिक सत्ता प्रातिभासिक सत्ता तथा पारमार्थिक सत्ता का ज्ञान होना परमावश्यक है। शास्त्र जब जगत् अथवा संसार को मिथ्या कहते हैं, तब परमार्थ सत्ता की दृष्टि से कहते हैं ना कि व्यावहारिक सत्ता की दृष्टि से।व्यावहारिक सत्ता का अर्थ है- काल्पनिक सत्ता /काम चलाऊ सत्ता/ टेंपरेरी सत्ता अर्थात् अस्थाई सत्ता। रोटी ,कपड़ा ,मकान, दुकान बहू ,बेटी ,माता-पिता ,भाई-बहन, पति पत्नी तथा शरीरों आदि को व्यावहारिक सत्ता से मिथ्या नहीं कहते हैं। पारमार्थिक अर्थात् अधिष्ठान दृष्टि माने मूल तत्व की दृष्टि से मिथ्या अथवा असत् कहते हैं। धर्मानुष्ठान की दृष्टि से जगत् को सत्य समझे बिना काम नहीं चलेगा। इसीलिए जगत् को पूर्णतया मिथ्या अथवा पूर्णतया सत्य भी नहीं कहा जा सकता है। शास्त्र इसीलिए दृश्य प्रपंच को मिथ्या ,माया एवं अनिर्वचनीय कहते हैं।

भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि जो मुझे तत्व से जान लेता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता है ।यह बात उन्होंने अपने शरीरादि से व्यावहारिक कार्यों एवं जीवनी आदि को लेकर नहीं कही है। अपने पारमार्थिक स्वरूप को लक्ष्य करके कहीं है। गीता को पढ़ना अथवा पाठ करना अथवा कण्ठस्थ करना अपराध नहीं है,परंतु श्री कृष्ण के उपदेशों के तात्पर्य को ना समझना ,ना समझने का प्रयत्न करना अथवा समझकर भी आचरण में ना लाना बहुत बड़ा अपराध है।‌

प्रातिभासिक सत्ता को स्वप्न जगत् के दृश्यों से समझ लेना चाहिए। जब किसी को सद्गुरू के माध्यम से तत्वज्ञान होता है, तब प्रतिभासिक सत्ता के समान ही व्यावहारिक सत्ता का अनुभव स्वयं ही हो जाता है । इसमें कोई संदेह नहीं है।

व्यवहार में शरीर अन्न , बहू, बेटी ,माता-पिता ,धन-संपत्ति सूर्य ,चंद्र ,जल ,अग्नि, वायु तथा सृष्टि आदि को काल्पनिक सत्य समझे बिना काम नहीं चलेगा यह बात साधकों को सदैव याद रखनी चाहिए।

किसी भी वस्तु को तोड़कर अथवा नष्ट करके नहीं देखना है कि सत्य है कि मिथ्या । सृष्टि जैसी दिखती है ,वैसी दिखती रहे, समझना यह है कि जिन पांच करणों से दिखाई दे रही है, वे करण सत्य हैं कि मिथ्या, स्वयंप्रकाश हैं या परप्रकाश, जड़ की श्रेणी में है या चेतन की श्रेणी में है। यह निश्चय निर्णय आपको ही करना है। यदि आपने मन ,बुद्धि तथा ज्ञानेंद्रियों आदि को जड़, अनात्मा अथवा परप्रकाश तथा परिवर्तनशील आदि समझ लिया तो आप स्वयम् समझ जाएंगे कि इनके द्वारा जानी जाने वाली वस्तुएं विकारी, जड़ तथा अनात्मा ही होंगी।

नियम यह है कि जिसके अस्तित्व पर जो वस्तु दिखाई देती है अर्थात् मालूम पड़ती है, वह उससे भिन्न होती ही नहीं है। इस दृष्टि से ब्रह्म से ईश्वर ,जीव, जगत् भिन्न नहीं है।दूसरा नियम यह भी है ,कि जिसकी सत्ता पर जो वस्तु मालूम पड़ती है, वह वस्तु व्यवहार में काम आने पर भी अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रखती है। इसीलिए उसे मिथ्या असत् अथवा बिना हुए ही दिखाई देती है ,ऐसा परमार्थ दृष्टि से कहा जाता है।

अब आप यदि इन नियमों के आधार पर देखेंगे, तो स्वयं अनुभव करेंगे कि नाम -रूपात्मक सृष्टि मानसिक अवधारणा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। यहां तक कि जन्म -मृत्यु, बंघ- मोक्ष भी काल्पनिक ही आपको लगने लगेंगे। आप देखें सभी शरीर अथवा दृश्य पदार्थ मिट्टी ,जल,वायु आदि के अस्तित्व पर ही दिखाई पड़ते हैं‌। अतः आप तत्व विचार करके कहेंगे कि जब ये शरीर नहीं बने थे, तब भी मिट्टी थी,जब शरीर निर्मित हुए तब भी मिट्टी से पृथक नहीं है, जब शरीर नष्ट होंगे , तब भी मिट्टी ही रहेगी। जैसे – आभूषण नहीं बने थे, तब भी स्वर्ण ही था आभूषण मालूम पड़ने लगे, तब भी स्वर्ण ही है ,आभूषणों के नाम – रूप नष्ट हो जाने पर स्वर्ण ही रहेगा।

इसीप्रकार जिस आत्म चैतन्य की सत्ता पर ईश्वर ,जीव, जगत् की सृष्टि मालूम पड़ रही है, वह पारमार्थिक सत्ता ही परम सत्य वस्तु है । प्रत्येक जीव तथा ईश्वर का भी वास्तविक अर्थात् असली स्वरूप आत्म चैतन्य तत्व ही है ।इसी ज्ञान से जीव की मुक्ति की बात भगवान श्री कृष्ण ने अपने उपदेशों में कही है, वेदांत शास्त्र भी इसी ज्ञान से जीवो की मुक्ति की बात करता है। अतः जो लोग उपरोक्त तीनों सत्ताओ के स्वरूप को परमार्थ ज्ञान प्राप्त करने के पहले ठीक से किसी ब्रह्मवेत्ता से नहीं समझ पाते हैं, वे ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या अथवा एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति आदि जैसे वाक्यों के तात्पर्य तथा लक्ष्य को नहीं समझ पाते हैं, उन्हें शास्त्रों की बातें उल्टी अथवा असत्य मालूम देती है‌ं।

1- कारण से कार्य अथवा अधिष्ठान से अध्यस्त की भिन्न सत्ता न होने के कारण सर्वं खल्विदं ब्रह्म निश्चय ही सब कुछ ब्रह्म ही है ,ऐसा कहा गया है।
२- ब्रह्म अर्थात् आत्म चैतन्य के अस्तित्व से अस्तित्ववान् मालूम पड़ने वाले ईश्वर, जीव, जगत् तथा अन्य किसी का भी स्वतंत्र अस्तित्व न होने के कारण – एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति कहा गया है।
3- ब्रह्म की चेतन सत्ता के अस्तित्व पर ईश्वर ,जीव ,जगत् की व्यवहारिक सत्ता के रूप में अभिव्यक्त हो रही है। इसीलिए परमार्थ दृष्टि से ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है कहा गया है।
4- वासुदेव: सर्वमिति का तात्पर्य अधिष्ठान और अध्यस्त के सिद्धांत से समझ लेना चाहिए।
5-सिया राम मय सब जग जानी‌ अथवा जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम मय जान। इन दोनों बातों के तात्पर्य को ब्रह्म और माया के स्वरूप को समझ कर धारण कर लेना चाहिए अर्थात् अनुभव कर लेना चाहिए।
6-जब यह कहा जाता है कि जगत् है ही नहीं, यह तो आकाश की नीलिमा,शीप की चांदी तथा रज्जू में सर्प, मरुस्थल में जल के समान प्रतीत हो रहा है । तब इसका तात्पर्य केवल इतना ही है कि जगत् अर्थात् दृश्य चूँकि ब्रह्म की सत्ता पर अध्यस्त है-जैसे स्वर्ण की सत्ता पर आभूषण ,कागज की सत्ता पर चित्र, जल कि सत्ता पर तरंगे । जल को समझ लेने पर यह सिद्ध हो जाता है कि तरंगे तो है ही नहीं जल ही जल है । इसी दृष्टांत के आधार पर जब कोई सद्गुरु की कृपा से आत्मज्ञान प्राप्त करता है, तब उपरोक्त सभी बातों का तात्पर्य ठीक – ठीक समझ में आ जाता है।

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